भाषा विवि में हुआ “हज़रत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मानवीय शिक्षाएँ” विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

Update: 2026-04-28 14:18 GMT


ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के अरबी विभाग के तत्वावधान में हज़रत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की शिक्षाओं को उजागर करने के उद्देश्य से “The Humanitarian Teachings of Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti” (हज़रत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मानवीय शिक्षाएँ) विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया।

मुख्य वक्ता डॉ. मोहम्मद मुश्ताक तजारवी (एसोसिएट प्रोफेसर, इस्लामिक स्टडीज़ विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली) ने अपने संबोधन में कहा कि ख्वाजा अजमेरी की शिक्षाएँ आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अंतरधार्मिक सौहार्द के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि ख्वाजा साहब ने सदैव कमजोरों, वंचितों और जरूरतमंदों की सहायता को प्राथमिकता दी और उनका दरबार हर वर्ग के लिए खुला रहा, जो एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था का उदाहरण है। उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य के लिए दो चीजें आवश्यक हैं—एक इबादत और दूसरी आज्ञापालन। इबादत अल्लाह का अधिकार है और आज्ञापालन का अर्थ है अल्लाह के बंदों के अधिकारों का पालन करना। उनकी शिक्षाओं में पड़ोसियों, रिश्तेदारों, माता-पिता के साथ अच्छे संबंधों पर विशेष बल दिया गया है। मुख्य अतिथि प्रोफेसर सैयद लियाकत हुसैन मुईनी (सज्जादा नशीन, अजमेर दरगाह एवं पूर्व प्रोफेसर, इतिहास विभाग, एएमयू अलीगढ़) ने अपने वक्तव्य में कहा कि सूफियों का मत था कि समस्त सृष्टि अल्लाह का परिवार है, इसलिए अल्लाह के निकट वही व्यक्ति श्रेष्ठ है जो उसके परिवार के लिए अच्छा हो। यह ख्वाजा साहब की मूल शिक्षा है, जिसे उन्होंने अजमेर में रहकर व्यापक रूप से प्रचारित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान समय में बढ़ती नफरत और विभाजन की प्रवृत्तियों का मुकाबला केवल इन्हीं सूफी शिक्षाओं से किया जा सकता है, जो प्रेम, धैर्य और सहिष्णुता पर आधारित हैं।

अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रोफेसर अजय तनेजा ने कहा कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए तीन गुण आवश्यक हैं—नदी के समान उदारता, सूर्य के समान प्रेम और धरती के समान विनम्रता। उन्होंने आगे कहा कि जिस प्रकार ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के दरबार में बिना भेदभाव के सभी धर्मों के लोग लाभ प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में भी सभी धर्मों के विद्यार्थी समान रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।

कार्यक्रम का संचालन मोहम्मद यासिर अराफात मलिक (रिसर्च स्कॉलर, अरबी विभाग) ने उत्कृष्ट ढंग से किया, जबकि तिलावत-ए-क़ुरआन की प्रस्तुति मोहम्मद मोहसिन खान (रिसर्च एसोसिएट, अरबी विभाग) ने की। महविश कुरैशी ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया तथा अरहमा खान ने नात-ए-रसूल पेश की, जिससे वातावरण आध्यात्मिक भाव से ओतप्रोत हो गया. सेमिनार के संयोजक प्रोफेसर मसूद आलम ने अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक सुधार और मानव सेवा का एक व्यापक मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने आचरण से यह संदेश दिया कि धर्म का मूल उद्देश्य मानवों के बीच प्रेम और सहानुभूति को बढ़ावा देना है।

अंत में अरबी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल हफीज़ ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस कार्यक्रम में विभिन्न बौद्धिक एवं शैक्षणिक क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया, जिनमें डॉ. पियूष त्रिवेदी, डॉ. वसी आज़म अंसारी, डॉ. दीक्षा, डॉ. आयशा शहनाज़ फातिमा, डॉ. मुजम्मिल करीम और डॉ. मोहम्मद मुदस्सिर प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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