तुलसीदास ने लोकभाषा के माध्यम से वैदिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया : प्रो. हरिशंकर मिश्र
ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ की अवधी शोध पीठ द्वारा गोस्वामी तुलसीदास जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं अवधी कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने की, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार के दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री एवं राज्य ललित कला अकादमी के उपाध्यक्ष माननीय गिरीश चंद्र मिश्र मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. हरिशंकर मिश्र ने गोस्वामी तुलसीदास के साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं जीवन के विविध पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि “गोस्वामी तुलसीदास की प्रत्येक पंक्ति एक मंत्र की तरह है।” उन्होंने कहा कि संस्कृत के महान विद्वान होने के बावजूद तुलसीदास ने लोकभाषा में रचनाएं कीं, क्योंकि उनका उद्देश्य वैदिक ज्ञान को लोकज्ञान में परिवर्तित कर उसे जन-जन तक पहुंचाना था।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि एवं साहित्य भूषण कमलेश मौर्य ‘मृदु’ ने तुलसीदास के चिंतन की सामाजिक उद्देश्यता पर चर्चा करते हुए कहा कि रामचरितमानस तुलसीदास द्वारा दिया गया श्रीराम का ग्रंथ-अवतार है। उन्होंने तुलसी साहित्य की व्यापक सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने गोस्वामी तुलसीदास को भारतीय समाज के विभिन्न विरोधाभासों और अंतर्विरोधों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला महान कवि बताया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास का साहित्य भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, नैतिक मूल्यों और सामाजिक समरसता का महत्वपूर्ण आधार है तथा उनकी रचनाएं आज भी समाज को दिशा देने में सक्षम हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. विभा सिंह द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत भाषण डॉ. योगेंद्र कुमार सिंह ने दिया। कार्यक्रम का संचालन अवधी शोध पीठ के समन्वयक डॉ. नीरज शुक्ल ने किया। संगोष्ठी का समन्वय कला एवं मानविकी संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. सौबान सईद के दिशा-निर्देशन में किया गया।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में अवधी कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता एवं संचालन अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि कमलेश मौर्य ‘मृदु’ ने किया। इस अवसर पर अतुल वाजपेयी, श्रीमती सोनी मिश्रा, संदीप अनुरागी एवं मनोज अवस्थी ‘शुकदेव’ ने अवधी भाषा में अपनी रचनाओं का काव्य-पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
कार्यक्रम के दौरान साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इनमें हिंदी विभाग की डॉ. आराधना अस्थाना की पुस्तक ‘लखनऊ के कत्थक घराने की हिंदी सेवा’ तथा डॉ. वीरेंद्र कश्यप ‘निडर’ की पुस्तक ‘ख्यातन के सिपाही’ शामिल रहीं।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, निदेशक एवं प्रभारी सहित अनेक शिक्षक उपस्थित रहे। इनमें डॉ. पूनम चौधरी, डॉ. सुमन कुमार, डॉ. राजेंद्र कुमार त्रिपाठी, डॉ. नलिनी मिश्र, डॉ. राजकुमार सिंह, डॉ. विपिन सिंह, डॉ. अंशुल पांडे, डॉ. आशीष शाही, डॉ. कृष्णा मुकुंद, डॉ. प्रशांत सिंह, डॉ. दीक्षा मिश्र एवं डॉ. निधि सिंह राठौड़ समेत बड़ी संख्या में शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
कार्यक्रम ने तुलसीदास के साहित्य, भारतीय संस्कृति और लोकभाषाओं की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने के साथ-साथ अवधी भाषा एवं साहित्य की जीवंत परंपरा को भी प्रभावशाली मंच प्रदान किया।