बठिंडा, 27 अक्टूबर, 2026: पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा ने सोमवार को केंद्रीय भूजल बोर्ड, उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, चंडीगढ़ के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य पंजाब के बठिंडा और गोनियाना मंडी क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता का अध्ययन करना है। इस अध्ययन में विशेष रूप से भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी और उससे होने वाले प्रदूषण पर ध्यान दिया जाएगा।

यह अध्ययन नेशनल एक्विफर मैपिंग एंड मैनेजमेंट (नैक्विम) प्रोग्राम के तहत किया जाएगा। इसके माध्यम से भूजल की गुणवत्ता की जांच एवं प्रदूषण से प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों की पहचान की जाएगी और भूजल को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक जानकारी जुटाई जाएगी।

समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के अवसर पर पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रो. रामकृष्ण वुसिरिका और केंद्रीय भूजल बोर्ड, चंडीगढ़ के क्षेत्रीय निदेशक श्री निधीश वर्मा उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय की ओर से कुलसचिव डॉ. विजय शर्मा और विश्वविद्यालय के नोडल अधिकारी प्रो. जे. के. पटनायक ने हस्ताक्षर किए। केंद्रीय भूजल बोर्ड की ओर से वैज्ञानिक-सी श्री कुलदीप गोपाल भारतीरिया ने हस्ताक्षर किए।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ की निदेशक प्रो. मोनिशा धीमान, अनुसंधान एवं विकास निदेशक प्रो. अंजना मुंशी, पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वी. के. गर्ग, भूविज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. बंदना सामंत, भूगोल विभाग के अध्यक्ष डॉ. एल. टी. ससांग गुइते, प्रो. सुनील मित्तल, प्रो. योगलक्ष्मी के. एन., प्रो. समीर दुरानी तथा संबंधित विभागों के अन्य शिक्षक भी उपस्थित रहे।

समझौते के तहत केंद्रीय भूजल बोर्ड मानसून से पहले और मानसून के बाद भूजल के नमूने एकत्र करेगा। इन नमूनों की जांच करके यूरेनियम, अन्य भारी धातुओं और पानी में मौजूद विभिन्न रासायनिक तत्वों की मात्रा का पता लगाया जाएगा। बोर्ड भूजल की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करेगा, प्रदूषण वाले क्षेत्रों के मानचित्र तैयार करेगा और भूजल स्तर की निगरानी भी करेगा। विश्वविद्यालय के तकनीकी सहयोग से अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाएगी।

दूसरी ओर, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भूजल में मौजूद खनिजों और रासायनिक तत्वों का अध्ययन करेंगे। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि भूजल में यूरेनियम कहां से आता है और किन कारणों से इसकी मात्रा बढ़ सकती है। विश्वविद्यालय यूरेनियम प्रदूषण से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का आकलन भी करेगा और इन जोखिमों को कम करने के उपायों का अध्ययन करेगा।

इस अध्ययन से उन क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जहां भूजल की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही यह भी पता लगाया जा सकेगा कि अलग-अलग समय पर प्रदूषण के स्तर में क्या बदलाव आते हैं और भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं। इसके निष्कर्षों से बठिंडा जिले के प्रभावित क्षेत्रों में भूजल की गुणवत्ता में सुधार, प्रदूषण के प्रभावों को कम करने के उचित उपायों की योजना बनाने तथा सुरक्षित और सतत पेयजल उपलब्ध कराने की रणनीतियां विकसित करने में मदद मिलेगी।

इस साझेदारी के माध्यम से दोनों संस्थान अपनी वैज्ञानिक जानकारी और तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए भूजल से जुड़ी समस्याओं को बेहतर ढंग से समझने तथा क्षेत्र में भूजल संसाधनों के संरक्षण और उचित प्रबंधन के लिए मिलकर काम करेंगे।