यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ (मनुस्मृति 3.56)
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भारत के नेता आज कल स्त्री स्वतंत्र के लिए बहुत व्याकुल दिखाई दे रहे है | नेता विपक्ष राहुल गाँधी ने मनु स्मृति का हवाला देते हुए नारी मुक्ति की बात की है . पर क्या वास्तव में भारत की नारी को इन नेताओं की ज़रूरत है? इस बात की चर्चा आवश्यक है . भारत में विभिन्न ग्रंथो में नारी को नर से ऊपर रखा गया है .
ऋग्वेद 10.85.46 (सूर्या सूक्त)
यह मन्त्र विवाह संस्कार के समय वधू के सम्मान और घर में उसके सर्वोपरि स्थान को दर्शाता है:
सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥
अर्थ: तुम अपने श्वसुर (ससुर) की सम्राज्ञी बनो, अपनी सासू माँ की सम्राज्ञी बनो, अपनी ननद की सम्राज्ञी बनो और अपने देवरों की सम्राज्ञी (गृह-स्वामिनी) बनकर रहो।
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ऋग्वेद में नारी की स्थिति से जुड़े प्रमुख बिंदु:
शिक्षा का अधिकार: ऋग्वेद काल में नारियों को वेदाध्ययन और यज्ञ करने का पूर्ण अधिकार था। गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा, और अपाला जैसी अनेक विदुषी महिलाओं (ऋषिकाओं) ने स्वयं वेद मंत्रों की रचना की है।
समान सहभागिता: ऋग्वेद (5.61.8) के अनुसार स्त्री और पुरुष समाज रूपी रथ के दो पहिए हैं, जो एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
यज्ञ की पूर्णता: बिना पत्नी के कोई भी धार्मिक या यज्ञीय कार्य पूर्ण नहीं माना जाता था, इसीलिए स्त्री को 'जायादेस्तम' (घर की आत्मा/आधार) कहा गया है।
अथर्ववेद 11.5.18 (कन्या की शिक्षा)
यह मंत्र यह स्पष्ट करता है कि वैदिक काल में कन्याओं के लिए ब्रह्मचर्य और शिक्षा प्राप्त करना कितना अनिवार्य था:
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्।
अर्थ: कन्या ब्रह्मचर्य (विद्या प्राप्ति और अनुशासन) का पालन करके ही योग्य एवं युवा पति को प्राप्त करती है।अथर्ववेद के अनुसार स्त्रियाँ 'सभा' और 'समिति' जैसी राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं में भाग लेती थीं और अपने विचार रखती थीं।
पारिवारिक उन्नति की आधारशिला: अथर्ववेद (3.24.7) में कहा गया है कि जिस घर में विद्वान और संस्कारी स्त्री होती है, वह घर समृद्धि और शांति से भर जाता है।
माता के रूप में पूजनीय स्थान: अथर्ववेद में स्त्री को सृष्टि के पालनकर्ता और भावी पीढ़ियों के निर्माणकर्ता के रूप में उच्च सम्मान दिया गया है।
यजुर्वेद में नारियों के सम्मान, उनकी बुद्धिमत्ता, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान पर विशेष बल दिया गया है। यजुर्वेद के मंत्रों में स्त्री को ज्ञान का पुंज और शक्तिस्वरूपी माना गया है।
यजुर्वेद 20.85 (विदुषी स्त्री की महिमा)
यह मंत्र स्त्री की बौद्धिक क्षमता और ज्ञान का वर्णन करता है:
अग्निश्च मा कामश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च कृतकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्।
तद् विद्वान् पश्यति दृश्यमानम्।
(यजुर्वेद में स्त्री को 'सुदुघा' यानी कल्याणकारी और ज्ञान बरसाने वाली कहा गया है।)
यजुर्वेद 10.26 (नारी का सम्मान और नेतृत्व)
यजुर्वेद में नारी को समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करने वाली माना गया है:
नारीं तु मह्यं रयये सुपुत्रां विश्ववाराम्।
अर्थ: स्त्री समस्त कल्याणकारी गुणों से युक्त, राष्ट्र और समाज को श्रेष्ठ संतान देने वाली तथा पूजनीय है।
यजुर्वेद 20.84 (स्त्री का तेज और राष्ट्र निर्माण)
यजुर्वेद में ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि स्त्रियों में तेज और सामर्थ्य बना रहे.
चारों वेदों में नारी की स्थिति का सार:
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वेदनारी का मुख्य रूप
ऋग्वेदसम्राज्ञी, विदुषी और समाज की मार्गदर्शिका
अथर्ववेदगृहपत्नी, शिक्षा (ब्रह्मचर्य) की अधिकारिणी और सभा-समिति की प्रतिभागी
यजुर्वेदराष्ट्र-निर्माता, तेजस्विनी और यज्ञ की सह-अधिकारिणी
सामवेदसंगीत-कला निपुण, सामगान करने वाली और आनंद की स्वरूपा
प्रमुख विदुषी महिलाएँ और उनका योगदान:
गार्गी वाचक्नवी:
योगदान: राजा जनक की सभा में महान ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ किया, जिसका उल्लेख बृहदारण्यक उपनिषद में है। उन्होंने ब्रह्म (परम सत्य) पर ऐसे गूढ़ प्रश्न पूछे थे कि याज्ञवल्क्य को भी स्वीकार करना पड़ा था कि उनका ज्ञान असाधारण है।
मैत्रेयी:योगदान: ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी और एक महान दार्शनिक। जब याज्ञवल्क्य ने संपत्ति का बँटवारा करना चाहा, तो मैत्रेयी ने धन लेने से मना करते हुए पूछा—"येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्?" (जिससे मुझे अमरता/आत्मज्ञान न मिले, उसका मैं क्या करूँ?)।
लोपामुद्रा:योगदान: महर्षि अगस्त्य की पत्नी। इन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के कई मंत्रों की रचना की (जैसे ऋग्वेद 1.179)। इन्होंने धर्म, गृहस्थ जीवन और अध्यात्म के संतुलन पर महत्वपूर्ण विचार दिए।
घोषा:योगदान: महर्षि कक्षीवान् की पुत्री। चर्मरोग से पीड़ित होने के बावजूद इन्होंने घोर तपस्या की और ऋग्वेद के 10वें मण्डल के सूक्तों (10.39 और 10.40) की रचना की, जिनमें अश्विन कुमारों की स्तुति की गई है।
अपाला:योगदान: अत्रि ऋषि की पुत्री। इन्होंने ऋग्वेद के 8वें मण्डल (8.91) के सूक्त की रचना की। इन्होंने इंद्र देव की स्तुति कर अपना रोग दूर किया और औषधि-विज्ञान तथा भक्ति भाव में योगदान दिया।
वाक् (अम्भृण पुत्री):योगदान: ऋग्वेद के प्रसिद्ध 'देवी सूक्त' (10.125) की रचयिता। इस सूक्त में उन्होंने स्वयं को संपूर्ण ब्रह्मांड की परम शक्ति (ब्रह्म स्वरूप) के रूप में अभिव्यक्त किया है। आज भी दुर्गा सप्तशती के पाठ में इस सूक्त का उपयोग होता है।
वैदिक विदुषियों की दो श्रेणियाँ:
ब्रह्मवादिनीवे स्त्रियाँ जो जीवन भर विवाह न करके वेद-अध्ययन, दर्शन और अध्यात्म साधना में लीन रहती थीं (उदा. गार्गी, वाक्)।
सद्योवधूवे स्त्रियाँ जो शिक्षा पूरी करने के बाद विवाह करके गृहस्थ जीवन अपनाती थीं और मंत्र-रचना भी करती थीं (उदा. लोपामुद्रा, अपाला)।
गार्गी और याज्ञवल्क्य संवाद :
गार्गी ने अपने प्रसिद्ध बाण-रूपी प्रश्न पूछे:
प्रथम प्रश्न: "हे याज्ञवल्क्य! जो स्वर्ग से ऊपर है, जो पृथ्वी से नीचे है, और जो इन दोनों के बीच में है तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्य कहलाता है—वह सब किसमें ओत-प्रोत है?"
याज्ञवल्क्य का उत्तर: "वह सब आकाश (सूक्ष्म अव्याकृत आकाश) में ओत-प्रोत है।"
द्वितीय प्रश्न (निर्णायक): "तो फिर वह आकाश किसमें ओत-प्रोत है?"
याज्ञवल्क्य का उत्तर — 'अक्षर ब्रह्म' का वर्णन:
इस प्रश्न के उत्तर में महर्षि याज्ञवल्क्य ने वैदिक साहित्य के सबसे महान दार्शनिक सिद्धांतों में से एक "अक्षर ब्रह्म" (अविनाशी परम सत्य) का वर्णन किया:
"हे गार्गी! ब्रह्मज्ञानी उस तत्त्व को 'अक्षर' कहते हैं। वह न स्थूल है, न सूक्ष्म; न छोटा है, न बड़ा; न लाल है, न जल की तरह बहता है... वह न चक्षु है, न श्रोत्र है, न वाक् है, न मन है। वह न किसी को खाता है और न उसे कोई खाता है।"
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा:
"हे गार्गी! इसी अक्षर परमेश्वर के प्रशासन में सूर्य और चंद्रमा अपनी-अपनी सीमाओं में टिके हुए हैं। इसी के भय से नदियाँ अपने-अपने मार्गों पर बहती हैं। जो इस अक्षर को जाने बिना इस संसार में हजारों वर्ष तक यज्ञ-तप करता है, उसका वह कर्म अंततः नाशवान है। और हे गार्गी! जो इस अक्षर तत्त्व को जाने बिना इस लोक से जाता है, वह अत्यंत दयनीय (कृपण) है।"
गार्गी की निष्पक्षता और निर्णय:
याज्ञवल्क्य का यह निर्गुण-निराकार ब्रह्म का वर्णन सुनकर गार्गी को पूर्ण संतोष हो गया। उन्होंने सभा के समस्त विद्वानों की ओर मुड़कर अत्यंत उदारता और निष्पक्षता से कहा:
"हे पूज्य विद्वानों! आप सब याज्ञवल्क्य को प्रणाम करके ही छूट सकते हैं। आपमें से कोई भी इन्हें ब्रह्मज्ञान की चर्चा में पराजित नहीं कर सकता।"
गार्गी-याज्ञवल्क्य संवाद का ऐतिहासिक महत्व:
स्त्री की बौद्धिक स्वतंत्रता: यह संवाद दर्शाता है कि वैदिक काल में स्त्रियों को सबसे उच्च दार्शनिक विषयों (अध्यात्म और ब्रह्मज्ञान) पर पुरुषों के साथ समान स्तर पर बिना किसी झिझक के शास्त्रार्थ करने का अधिकार था।
सत्य की खोज का सर्वोच्च मानक: गार्गी की विद्वत्ता और सभा में विद्वानों के बीच उनकी स्वीकृति यह सिद्ध करती है कि उस युग में ज्ञान का सम्मान लिंग (Gender) से ऊपर था।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा॥ (मनुस्मृति 3.57)
अर्थ: जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखी रहती हैं, वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सदैव प्रगति करता है।
सकारात्मक व्यवस्थाएँ:
संपत्ति का अधिकार (स्त्रीधन): मनुस्मृति (9.194) में 'स्त्रीधन' के रूप में महिला के स्वयं के धन/उपहारों पर उसका पूर्ण अधिकार स्वीकार किया गया है, जिस पर पति या पुत्र का हक नहीं होता।
संरक्षण दायित्व: पिता, पति और पुत्र का यह धर्म बताया गया है कि वे स्त्री की आवश्यकताओं, भोजन, वस्त्र और आभूषणों की पूर्ति करके उसे सदैव संतुष्ट रखें।
मनुस्मृति के नौवें और पांचवें अध्याय में स्त्रियों की स्वतंत्रता को सीमित करने और उन्हें जीवनभर किसी न किसी पुरुष के संरक्षण में रखने का विधान है:
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ (मनुस्मृति 9.3)
अर्थ: बाल्यावस्था में पिता स्त्री की रक्षा करता है, युवावस्था में पति रक्षा करता है, और वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है; स्त्री स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है (यानी उसे सदैव संरक्षण में रहना चाहिए)।
बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता।
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित्कार्यं गृहेष्वपि॥ (मनुस्मृति 5.147)
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अर्थ: बाल्यावस्था, युवावस्था या वृद्धावस्था—किसी भी अवस्था में स्त्री को घर के भीतर भी स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
संरक्षणवादी दृष्टिकोण समर्थकों का मानना है कि मनु ने 'अयोग्यता' के कारण नहीं, बल्कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में सुरक्षा (Security) के दृष्टिकोण से स्त्री को सदैव पुरुषों के संरक्षण में रखने की बात कही।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण आलोचकों और समाज सुधारकों (जैसे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर) के अनुसार, मनुस्मृति ने स्त्रियों के स्वावलंबन, शिक्षा और स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकारों को छीनकर उन्हें पुरुषों पर आश्रित बना दिया।