सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सीबीआई चीफ की तर्ज पर हो

Update: 2023-03-02 12:04 GMT


चुनाव आयोग को महज एक कठपुतली मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अब सरकार के हाथों में इसकी कमान नहीं होगी। एक समिति जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल होंगे, वो मुख्य चुनाव आयुक्त और बाकी आयुक्तों की नियुक्ति करेगी। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने और जो कुछ कहा वो भारत के लोकतंत्र, राजनीकति और मीडिया को भी शर्मसार करने वाला है।

कई बार इस सूची में 40 नाम तक होते हैं। इस सूची के आधार पर तीनों नामों को एक पैनल तैयार किया जाता है। इन नामों पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति विचार करते हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री पैनल में शामिल अधिकारियों से बात करके कोई एक नाम राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। इन नाम के साथ प्रधानमंत्री के नोट भी भेजते हैं। इसमें उस शख्स के चुनाव आयुक्त चुने जाने की वजह भी बताई जाती हैं।

जस्टिस के एम जोसेफ ने कहा कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखी जानी चाहिए। नहीं तो इसके अच्छे परिणाम नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि वोट की ताकत सुप्रीम है, इससे मजबूत से मजबूत पार्टियां भी सत्ता हार सकती हैं। इसलिए इलेक्शन कमीशन का स्वतंत्र होना जरूरी है। यह भी जरुरी है कि यह अपनी ड्यूटी संविधान के प्रावधानों के मुताबिक और कोर्ट के आदेशों के आधार पर निष्पक्ष रूप से कानून के दायरे में रहकर निभाए।5 सदस्यीय बेंच ने कहा कि ये कमेटी नामों की सिफारिश राष्ट्रपति को करेगी। इसके बाद राष्ट्रपति मुहर लगाएंगे।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में साफ कहा कि यह प्रोसेस तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बना लेती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह चयन प्रक्रिया CBI डायरेक्टर की तर्ज पर होनी चाहिए।

पिछले साल अरुण गोयल की नियुक्ति पर हुआ था बवाल, 19 नवंबर को केंद्र सरकार ने पंजाब कैडर के आईएएस अफसर अरुण गोयल को चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया था।

अरुण गोयल की नियुक्त पर इसलिए विवाद हुआ, क्योंकि वो 31 दिसंबर 2022 को रिटायर होने वाले थे. 18 नवंबर को उन्हें वीआरएस दिया गया और अगले ही दिन चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया । इस पर सुप्रीम कोर्ट में सीनियरस एडवोकेट प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया कि जिन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया है, वो एक दिन पहले तक केंद्र सरकार में सचिव स्तर के अधिकारी थे. अचानक उन्हें वीआरएस दिया जाता है और एक ही दिन में चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया जाता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाते हुए कहा था कि इस नियुक्त में कोई 'Hanky Panky' यानी गड़बड़झाला तो नहीं हुआ है।

अदालत ने सवाल उठाया, हमने 18 नवंबर को सुनवाई शुरू की. उसी दिन फाइल आगे बढ़ गई, उसी दिन क्लियरेंस भी मिल गया, उसी दिन आवेदन भी आ गया और उसी दिन नियुक्ति भी हो गई. फाइल 24 घंटे भी नहीं घूमी। फाइल को बिजली की गति से क्लियर क्यों किया गया? हालांकि, इन सारे सवालों पर केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने कहा था कि सबकुछ 1991 के कानून के तहत हुआ है और अभी फिलहाल ऐसा कोई ट्रिगर पॉईंट नहीं है जहां अदालत को दखल देने की जरूरत पड़े।

(प्रियांशु 

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