भाषा, शिक्षा और नेतृत्व जीवन निर्माण की त्रिवेणी हैं : प्रो. प्रभाशंकर शुक्ल

Update: 2026-01-09 13:26 GMT


ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के हाइब्रिड हॉल में लर्न , लांच एंड लीड विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह व्याख्यान नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के माननीय कुलपति प्रो. प्रभाशंकर शुक्ल द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने शिक्षा, भाषा, सामाजिक व्यवहार, नेतृत्व और नवाचार के आपसी संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने व्याख्यान में प्रो. शुक्ल ने कहा कि मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है और सीखना, आरंभ करना तथा नेतृत्व करना जीवन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। भारत की “एकता में विविधता” को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे खान–पान, रहन–सहन, व्यवहार, दृष्टिकोण और सीखने के तरीके भिन्न हो सकते हैं, किंतु यही विविधता हमें एक सूत्र में बाँधती है। उन्होंने कहा कि भाषा इस विविधता को जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है, और इसी कारण भारत विश्व का सबसे समृद्ध सांस्कृतिक राष्ट्र है।

प्रो. शुक्ल ने क्षेत्रीय भाषाओं के संवर्धन पर विशेष बल देते हुए कहा कि उनका संरक्षण और प्रचार-प्रसार हम सभी का दायित्व है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह नीति कम से कम तीन भाषाओं के अध्ययन पर बल देती है, जिससे बहुभाषिकता और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा मिलता है।

उन्होंने शिक्षकों और छात्रों से आत्ममंथन का आह्वान करते हुए प्रश्न उठाया कि हम देश को क्या योगदान दे रहे हैं और उसका प्रतिफल क्या है —इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि माँ हमारी पहली गुरु होती है, इसके बाद प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा का क्रम आता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य, लक्ष्य और मूल्यों को समझना होना चाहिए।

प्रो. शुक्ल ने कहा कि लॉंच शिक्षकों से जुड़ा है, किंतु लीड करना एक शिक्षाविद् के रूप में स्वयं को विकसित करने से संबंधित है। एक अच्छा शिक्षक वही है, जो विद्यार्थियों को केवल विषय नहीं, बल्कि जीवन के सही पाठ भी सिखाए। उन्होंने शिक्षा, स्टार्टअप और रोजगार के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि आज आवश्यकता है कि हम अपने ज्ञान को व्यावहारिक और व्यावसायिक रूप से उपयोग में लाने की दिशा में सोचें।

उन्होंने मानवीय संबंधों, नैतिक मूल्यों और आचार–संहिता पर कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया। विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों से उन्होंने कहा कि वे अपनी नींव मजबूत करें, दूसरों से सीखें, आलोचनात्मक चिंतन विकसित करें, विषय की गहराई में जाएँ और यह सोचें कि क्या उनके ज्ञान का नवाचार और व्यावसायीकरण संभव है।

भविष्य के लिए आवश्यक कौशलों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने आलोचनात्मक चिंतन, डेटा साक्षरता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सृजनात्मकता को अत्यंत आवश्यक बताया। साथ ही उन्होंने शोध एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के विकास तथा साझेदारी के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करने पर भी बल दिया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने कहा कि सफलता की कोई एक कुंजी नहीं होती। उन्होंने प्रो. प्रभाशंकर शुक्ल के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि आज आवश्यकता है नवाचार, उत्पादन और समृद्धि की। उन्होंने विद्यार्थियों से नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनने का आह्वान किया और कहा कि शिक्षकों की भूमिका यहीं से प्रारंभ होती है—जहाँ वे छात्रों को उद्यमिता और नवाचारी सोच की ओर मार्गदर्शन देते हैं।

कार्यक्रम का सफल आयोजन एवं संचालन डॉ. नलिनी मिश्रा द्वारा किया गया। व्याख्यान में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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