राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय भाषा परिवार पर शोध-पत्र प्रस्तुत

Update: 2026-01-28 13:50 GMT



महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आज़मगढ़ के अंग्रेज़ी विभाग के शोधार्थी मारुति नंदन तिवारी ने दीनदयाल विश्वविद्यालय तथा भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में सहभागिता कर विश्वविद्यालय को गौरवान्वित किया। इस अवसर पर उन्होंने “भारतीय भाषा परिवार: भाषिक अखंडता का पूर्वावलोकन एवं भविष्यावलोकन” विषय पर आधारित अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया।

शोध-पत्र की प्रस्तुति के दौरान वक्ता ने कहा कि भारतीय भाषा परिवार केवल भाषाओं का वर्गीकरण नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और बौद्धिक परंपरा का जीवंत प्रतिबिंब है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में विकसित विभिन्न भाषाएँ और उपभाषाएँ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं, जो भारतीय भाषाओं की मौलिक एकता और अखंडता को रेखांकित करती हैं।वक्ता ने यह भी प्रतिपादित किया कि भाषिक अखंडता को केवल व्याकरणिक नियमों या भाषावैज्ञानिक ढाँचों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। इसमें भाषा की संरचना, शब्द-संपदा, ध्वनि-परंपरा, लोक-संवेदना, सांस्कृतिक भावभूमि तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित ज्ञान-परंपरा समाहित होती है। भारतीय भाषाएँ केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि विचार, भावना और सामाजिक अनुभव की निरंतर धारा हैं।

शोध-पत्र की प्रस्तावना में भाषा के दार्शनिक और वैचारिक महत्व को रेखांकित करते हुए वक्ता ने महाकवि कालिदास के सुप्रसिद्ध श्लोक—“वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये…”—का उल्लेख किया। इसके माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाषा और अर्थ की अविभाज्य एकता ही भारतीय भाषाओं की मूल आधारशिला है, जिसने भारतीय ज्ञान-परंपरा, दर्शन और साहित्य को युगों तक समृद्ध बनाए रखा है।

शोध-पत्र में भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक विकास, पारस्परिक प्रभाव, सांस्कृतिक समन्वय तथा समकालीन वैश्वीकरण और तकनीकी युग में भाषिक चुनौतियों पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया गया। वक्ता ने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और तकनीकी एकीकरण के लिए समन्वित भाषिक दृष्टि और ठोस नीतिगत प्रयास अनिवार्य हैं।

इस अवसर पर सम्मेलन में उपस्थित शिक्षाविदों, भाषाविदों और शोधकर्ताओं ने शोध-पत्र की अकादमिक गहराई और समकालीन प्रासंगिकता की सराहना की। यह शोध-प्रस्तुति भारतीय भाषाओं की साझा विरासत, राष्ट्रीय एकता और भावी भाषिक दिशा पर एक महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान के रूप में देखी गई।विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की राष्ट्रीय स्तर की अकादमिक सहभागिता से महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रतिष्ठा और शोध-संस्कृति को नया आयाम मिलता है।



 


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