हाशिए से मुख्यधारा तक: भारत में तृतीय लिंग की यात्रा विषय पर भाषा विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

Update: 2026-02-05 12:00 GMT


लखनऊ। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ में हाशिए से मुख्यधारा तक: भारत में तृतीय लिंग की यात्रा विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का आयोजन विश्वविद्यालय के अटल सभागार में किया गया।

उद्घाटन सत्र की शुरुआत विधि अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पीयूष कुमार त्रिवेदी द्वारा प्रस्तुत स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पधारे सभी गणमान्य अतिथियों, विद्वानों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का औपचारिक स्वागत किया। स्वागत संबोधन के उपरांत अतिथियों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का संदेश देते हुए अतिथियों को पौधे भेंट किए गए।

दीप प्रज्वलन के पश्चात विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति एवं संगोष्ठी के संरक्षक प्रो. अजय तनेजा ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय अत्यंत संवेदनशील है और वर्तमान समय की आवश्यकता को रेखांकित करता है। मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केंद्र नहीं होते, बल्कि ऐसे अधिगम मंच होते हैं जहाँ युवा पीढ़ी समानता, समावेशन और गरिमा जैसे मूल्यों को आत्मसात करती है। उन्होंने कहा कि यह विषय शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक जीवन के क्षेत्रों में हो रहे परिवर्तन का संकेत देता है। कुलपति ने कहा कि इस संगोष्ठी के आयोजन का उद्देश्य तृतीय लिंग समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया को सशक्त बनाना है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विश्वविद्यालय परिसर सुरक्षित और समावेशी होने चाहिए, जहाँ संवेदनशील संवाद को प्रोत्साहन मिले और केवल स्वीकार्यता ही नहीं बल्कि समान अवसर भी उपलब्ध कराए जाएँ। उन्होंने स्पष्ट किया कि समावेशन कोई दया या अनुकंपा नहीं, बल्कि न्याय का प्रश्न है, जिसमें चिंतन, उत्तरदायित्व और ठोस कार्यवाही आवश्यक है। यही इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य है।

कुलपति के संबोधन के उपरांत संगोष्ठी की संयोजक डॉ. श्वेता त्रिवेदी ने दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का विस्तृत अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने तृतीय लिंग समुदाय से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक और न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करते हुए न्यायिक मान्यता से सामाजिक समावेशन तक की यात्रा पर प्रकाश डाला।

इसके बाद मुख्य वक्ता डॉ. नीरजा माधव, आकाशवाणी गोरखपुर की पूर्व निदेशक और प्रसिद्ध लेखिका, ने अपने व्याख्यान में बताया कि आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए विभिन्न कार्यक्रमों पर शोध करते समय उन्हें तृतीय लिंग समुदाय और उनकी संस्कृति को समझने की जिज्ञासा हुई। उन्होंने तृतीय लिंग समुदाय की कोड भाषा, गुरु-शिष्य परंपरा और सांस्कृतिक परंपराओं पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. माधव ने ट्रू हर्माफ्रोडाइट और स्यूडो हर्माफ्रोडाइट की अवधारणाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि कई बच्चे 13 से 14 वर्ष की आयु में ही अपनी लैंगिक पहचान को लेकर सामने आ जाते हैं। उन्होंने कहा कि उभयलिंगी को भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व प्राप्त है और प्राचीन शास्त्रों में तृतीय लिंग का उल्लेख मिलता है। अम्बा और शिखंडी जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने किन्नर शब्द की व्याख्या की तथा हिजड़ा शब्द से जुड़े सामाजिक अर्थों को स्पष्ट किया। उन्होंने यह भी कहा कि साहित्यकार समाज का मार्गदर्शक होता है और उसकी लेखनी सामाजिक परिवर्तन की दिशा तय कर सकती है।

इसके पश्चात विशेष अतिथि इंजीनियर अवनीश चंडेल ने समानता के विषय पर अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे पिछले दस वर्षों से फिनलैंड में वह कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि वहाँ सामाजिक ढाँचे में समानता को केंद्रीय मूल्य के रूप में देखा जाता है और वास्तविक खुशी समानता से ही उत्पन्न होती है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समाज को सशक्त बनाने के लिए सभी को मुख्यधारा में शामिल करना आवश्यक है।

कार्यक्रम में उपस्थित विशिष्ट अतिथि प्रो. दीपक सिंह चौहान, डीन, डिपार्टमेंट ऑफ़ लॉ, सेंट्रल यूनिवर्सिटी पंजाब, भटिंडा ने तृतीय लिंग समुदाय के लिए सरकार द्वारा संचालित विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने स्माइल गरिमा से लेकर स्माइल परियोजना तक का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र वहीं सुदृढ़ होता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पहचान और विचार व्यक्त करने का अधिकार प्राप्त हो। वहीं विशिष्ट अतिथि प्रो. प्रीति मिश्रा, विभागाध्यक्ष, डिपार्टमेंट ऑफ़ ह्यूमन राइट्स, बीबीएयू ने विभिन्न जजमेंट्स के बारे में विस्तार पूर्वक बताया।

संगोष्ठी की मुख्य अतिथि माँ पवित्र, निम्बोरकर (नंदगिरी), श्री श्री १००८ महामंडलेश्वर, उज्जैन पीठ ( एमपी), जूना अखाड़ा/प्रेसिडेंट ऑफ़ समर्पण ट्रस्ट अमरावती महाराष्ट्रा ने अपने संबोधन में अपने जीवन संघर्षों की प्रेरक कथा साझा की। उन्होंने बताया कि शिक्षा और जीवन के संघर्ष के दौरान परिवार से प्राप्त सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी। उन्होंने कहा कि आज भी सामाजिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं और यदि व्यक्ति में क्षमता और आत्मविश्वास है तो उसे स्वयं अपनी पहचान स्थापित करनी होती है। उन्होंने भारतीय इतिहास और शास्त्रों में तृतीय लिंग की उपस्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म हमें यह सिखाता है कि हम सभी जाति और वर्ग से परे समान रूप से इंसान हैं। उन्होंने तृतीय लिंग समुदाय को संवैधानिक मान्यता दिए जाने के लिए सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि विद्यार्थी देश का भविष्य हैं तथा हम सभी एकजुट होकर देश को आगे बढ़ा सकते हैं।

आज के सत्र में पैनल डिस्कशन के साथ दो तकनीकी सत्रों का भी आयोजन किया गया जिसमें देश विदेश के शोधार्थियों द्वारा पत्र प्रस्तुत किए गए ।

आज के कार्यक्रम का संचालन विद्यार्थी अमन त्रिपाठी के द्वारा किया गया । धन्यवाद ज्ञापन डॉ अंशुल पांडेय के द्वारा दिया गया। वहीं संकाय अध्यक्ष प्रो. मसूद आलम, प्रो. फ़खरे आलम, प्रो. शूरा दारा पूरी, डॉ नीरज शुक्ला,

डॉ दीक्षा, तान्या, रविकेश, डॉ. भानु , डॉ कृष्ण मुकुंद सहित डॉ. आशीष शाही सहित सभी शिक्षक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे ।

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