आदिवासी संवेदना और प्रतिरोध की सशक्त लेखिका हैं महाश्वेता देवी : रणेन्द्र

Update: 2026-02-11 13:57 GMT


प्रयागराज। महाश्वेता देवी की अधिकांश रचनाएं आदिवासी जीवन, संघर्ष और संवेदना पर केंद्रित हैं। उनकी लेखनी ने आदिवासी अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित किया है। यह बात कथाकार एवं चिंतक रणेन्द्र ने कही। वे सोमवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग की ओर से प्रो धीरेन्द्र वर्मा शताब्दी सभागार में आयोजित “आदिवासी साहित्य एवं महाश्वेता देवी” विषय पर विशेष व्याख्यान में बोल रहे थे।

इस मौके पर कथाकार रणेन्द्र ने बताया कि महाश्वेता देवी को साहित्यिक परिवेश पारिवारिक विरासत के रूप में मिला, जिसमें मनीष घटक और ऋत्विक घटक का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने महाश्वेता देवी के प्रथम उपन्यास “झांसी की रानी” का उल्लेख करते हुए कहा कि आगे चलकर उन्होंने इतिहास और लोकसंघर्ष को अपने लेखन का केंद्रीय विषय बनाया।

उन्होंने बताया कि कुमार सुरेश सिंह के शोध को आधार बनाकर महाश्वेता देवी ने बिरसा मुंडा पर महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य किया। वर्ष 1967 में “लटका हुआ धुंधलका” तथा 1977 में प्रकाशित उपन्यास “अरण्येर अधिकार” ने आदिवासी प्रतिरोध की गाथा को व्यापक पहचान दिलाई, जिसके लिए उन्हें 1979 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बिरसा मुंडा को राष्ट्रीय नायक के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने में महाश्वेता देवी की लेखनी की बड़ी भूमिका रही। राणेन्द्र ने महाश्वेता देवी की चर्चित कहानी “द्रौपदी” का संदर्भ देते हुए कहा कि उन्होंने मिथकीय संरचनाओं से अलग हटकर द्रौपदी को प्रतिरोध के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि महाश्वेता देवी लोकतंत्र, कानून और सत्ता संरचनाओं की आलोचनात्मक पड़ताल करती हैं तथा आदिवासी समुदाय के प्रकृति, पशु और वनस्पति से गहरे संवेदनात्मक संबंध को रेखांकित करती हैं। उन्होंने कहा कि महाश्वेता देवी की कृति में निर्वस्त्र स्त्री का प्रतिरोध कहीं न कहीं से बंगाल की शाक्त परंपरा और दक्षिण की अक्क महादेवी से प्रेरित प्रतीत होती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. लालसा यादव ने कहा कि इस व्याख्यान से विद्यार्थियों की समझ समृद्ध हुई है। उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम में महाश्वेता देवी की कहानी “बायन” शामिल है, जिससे विद्यार्थियों को उनके साहित्यिक सरोकारों को समझने का अवसर मिलता है।

प्रो. कुमार वीरेन्द्र ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि महाश्वेता देवी मिथकों को जीवंत चरित्रों में ढालने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। उन्होंने पलामू क्षेत्र, कुमार सुरेश सिंह, रेणु और अज्ञेय के संदर्भों का उल्लेख करते हुए आदिवासी यथार्थ के साहित्यिक दस्तावेज़ीकरण की परंपरा पर प्रकाश डाला। संचालन डॉ. वीरेन्द्र कुमार मीणा ने और संयोजन डॉ. गाजूला राजू व डॉ. जनार्दन ने किया।

इस अवसर पर प्रो. संतोष भदौरिया, प्रो. भूरेलाल, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. बृजेश कुमार पाण्डेय, प्रो. चंदा देवी, डॉ. अमृता, प्रो. बसंत त्रिपाठी, डॉ. प्रियम अंकित, डॉ. मीना कुमारी, डॉ. गाज़ुला राजू, डॉ. दीनानाथ मौर्य, वरिष्ठ आलोचक रवि भूषण, डॉ.शिव कुमार यादव डॉ. प्रेमशंकर, मृत्युंजय, डॉ. कामिनी, डॉ. जनार्दन, कवि शैलेय, रामजी राय, प्रो. सुनील विक्रम सिंह, अंकुर, कुलेंद्र चतुर्वेदी, अतुल यादव, आनंद यादव, प्रदीप पार्थिव, आर्यन, विवेक, रिशु सहित अनेक शोधार्थी, छात्र और शहर के साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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