पंजाब के भूजल संकट पर मंथन: सीयू पंजाब में पंजाब में भूजल गुणवत्ता संबंधी मुद्दे एवं चुनौतियाँ विषयक दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ
बठिंडा, 16 फरवरी 2026: पंजाब में तीव्र गति से घटते भूजल स्तर को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयू पंजाब) में सोमवार को “पंजाब में भूजल गुणवत्ता संबंधी मुद्दे एवं चुनौतियाँ” विषयक दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। इस कार्यशाला में प्रख्यात वैज्ञानिकों, तकनीकी विशेषज्ञों एवं नीति-निर्माताओं ने भाग लेकर राज्य के जल संकट के स्थायी समाधान पर विचार-विमर्श किया।
कुलपति प्रो. राघवेंद्र प्रसाद तिवारी के संरक्षण में विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं हितधारकों को भूजल की वैज्ञानिक निगरानी एवं सतत प्रबंधन के लिए व्यावहारिक उपकरणों से संबंधित जानकारी एवं प्रशिक्षण प्रदान करना है।
उद्घाटन सत्र में कुलसचिव डॉ. विजय शर्मा ने भूजल क्षरण एवं प्रदूषण की समस्या को गंभीर बताते हुए प्रमाण-आधारित समाधान की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. सुनील मित्तल ने प्रतिभागियों का स्वागत किया, जबकि डॉ. पी.के. साहू ने दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीति के समन्वय की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
मुख्य तकनीकी व्याख्यान में केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की वैज्ञानिक सुश्री अमनदीप कौर ने पंजाब के भूजल परिदृश्य की चिंताजनक स्थिति प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि राज्य/संघ राज्य क्षेत्र-वार भूजल संसाधन आकलन के अनुसार पंजाब में प्राकृतिक पुनर्भरण की तुलना में कहीं अधिक भूजल दोहन किया जा रहा है। जहाँ 17.07 बीसीएम भूजल उपलब्ध है, वहीं 28.01 बीसीएम का उपयोग हो रहा है, जिसके कारण 117 ब्लॉक आधिकारिक रूप से अतिदोहन (ओवर-एक्सप्लॉइटेड) श्रेणी में आ चुके हैं।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के डॉ. गोपाल कृष्णन ने समस्थानिक (आइसोटोप) आधारित तकनीकों को “जल का फिंगरप्रिंट” बताते हुए समझाया कि इनके माध्यम से भूजल के स्रोत, आयु और पुनर्भरण क्षेत्रों की पहचान कर प्रभावी संरक्षण रणनीतियाँ तैयार की जा सकती हैं।
पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर (पीआरएससी) के निदेशक डॉ. बृजेंद्र पतेरिया एवं डॉ. एस.के. साहू ने बताया कि राज्य में लगभग 80–85% भूजल कृषि में उपयोग हो रहा है, जिस पर जलवायु परिवर्तन का भी प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने वास्तविक समय की निगरानी, जल भंडारण आकलन और वर्षा पूर्वानुमान के लिए जीआईएस, उपग्रह एवं एआई आधारित तकनीकों के उपयोग के महत्त्व को रेखांकित किया।
जल आपूर्ति एवं स्वच्छता विभाग के अभियंता जे.जे. गोयल एवं गुरजोत कौर ने राज्य की त्रिस्तरीय जल गुणवत्ता निगरानी प्रणाली एवं शोधन उपायों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जल जीवन मिशन के तहत सुरक्षित ग्रामीण पेयजल उपलब्ध कराने में सामुदायिक भागीदारी और 24×7 शिकायत निवारण तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। पहले दिन का समापन प्रो. स्मीर दुरानी के जल गुणवत्ता आकलन पर व्याख्यान और पैनल चर्चा के साथ हुआ।
कार्यशाला के दूसरे दिन विश्वविद्यालय के शिक्षक उथले भूजल में यूरेनियम और फ्लोराइड की समस्या, पंजाब की जल संबंधी चुनौतियों और आधुनिक तकनीकों व प्रयोगशाला उपकरणों के उपयोग पर व्यावहारिक प्रशिक्षण देंगे।
यह कार्यशाला वैज्ञानिकों, प्रशासकों एवं हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देते हुए भूजल संरक्षण और सुरक्षित, सतत जल संसाधनों के लिए व्यावहारिक एवं प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।