लखनऊ। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के अरबी विभाग द्वारा “प्राचीन काल में अरबी आलोचना” विषय पर एक सारगर्भित व्याख्यान का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को अरबी साहित्य में आलोचना की भूमिका, उसके स्वरूप एवं विभिन्न विधाओं से परिचित कराना रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के अरबी विभाग के प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. रियाज अहमद रियाजी रहे। अपने व्याख्यान में उन्होंने अरबी साहित्य में आलोचना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “आलोचना साहित्य की आत्मा है, जो किसी भी रचना के गुण-दोष को उजागर कर उसे उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करती है।” उन्होंने आलोचना की प्रमुख विधाओं—भाषिक आलोचना, भावात्मक आलोचना एवं छंदात्मक आलोचना—का विस्तार से विवेचन करते हुए विद्यार्थियों को इनके व्यावहारिक पक्षों से अवगत कराया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अरबी विभागाध्यक्ष डॉ. अब्दुल हफीज ने की। उन्होंने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए उनके शैक्षिक एवं साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मुजम्मिल करीम ने किया, जबकि अंत में डॉ. मोहम्मद मुदस्सिर ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं छात्रों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस अवसर पर प्रोफेसर मसऊद आलम, डॉ. आयशा शहनाज फातिमा सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। यह व्याख्यान विद्यार्थियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी सिद्ध हुआ, जिससे उन्हें साहित्यिक समालोचना की मूलभूत अवधारणाओं को समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिली।